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मनीषी की लोकयात्रा

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कविराज जी के दार्शनिक चिंतन और कृतित्व से भारतीय संस्कृति तथा साहित्य अनेक विध समृद्ध हुआ है. वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय (पूर्व गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज, बनारस) और उसका विश्वप्रसिद्ध 'सरस्वती-भवन' विविध रूपों में उनके द्वारा की गयी सेवाओं से ही वर्त्तमान स्थिति प्राप्त करने में समर्थ हुआ. यह हिंदी-भाषी क्षेत्र का सौभाग्य था की पूर्वी बंगाल में जन्मा ग्रहण करते हुए भी इस महापुरुष की शिक्षा-दीक्षा और साधना भूमि होने का गौरव उसे प्राप्त हुआ. भौतिक दृष्टि से जन्मभूमि के आकर्षक एवं उत्कर्षविधायक प्रलोभनों तथा दबाओं के बावजूद इनकी काशिनिष्ठा ढृढ़ रही और वही आजीवन इनकी क्षेत्र-संन्यास-स्थली बानी रही. इनका अपना विशीष्ट क्षेत्र दर्शन, भक्तिसाधना तथा तंत्र था. इन विषयों पर पिछले पचास वर्षों में निर्मित हिंदी साहित्य के वे प्रमुख प्रेरणास्रोत रहे हैं.

मरणोत्तर जीवन का रहस्य

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पारलौकिक जगत से सम्बंधित अनुभवपूर्ण मौलिक एक अदभुत शोध ग्रन्थ।

महाकविकालिदासविरचितं रघुवंशम

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Raghuvamsam of Kalidasa 'Sanjivini" Commentary of Mallinatha and 'Chandrakala' Hindi Commentary by Dr. Shrikrishanamani Tripathi.

महायानसूत्रालङ्कार: (आर्यमैत्रेयविरचितःअनेकविधसूची-पाठान्तरादिसंवलितः विज्ञानवादस्य प्रमुखो ग्रन्थः),Mahayanasutralankar by Aryamaitreya & Asanga

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' महायानसूत्रालङ्कार ' विज्ञानवाद का सबसे प्रधान ग्रन्थ है। ' महायानसूत्रालङ्कार ' गुरु मैत्रयनाथ एवम उनके शिष्य आर्य असङ्गकी सम्मिलित कृति है। मूलभाग मैत्रेयनाथ का और टीकाभाग आर्य असङ्ग का कहा जाता है।

महावग्गपालि ( मूल पालि एवं हिंदी अनुवाद सहित ) The Mahavaggapali ( Pali Text with Hindi Translation )

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भगवान बुद्ध के प्रवचन काल (पैंतालीस वर्षों ) में उनका अमूल्य उपदेशसंग्रह विषय - विभाजन करते हुए, इसे तीन भागों में संग्रह किया गया । यह संग्रह त्रिपिटक कहलाया ये तीन पिटक हैं - १. विनय पिटक २.सुत्तपिटक ३.अभिधम्मपिटक