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जातकपारिजातः द्वितीय भाग
ज्योतिष के संहिता, होरा और सिद्धांत- इन तीन विषयों में प्रस्तुत कृति का स्थान होरा के अंतर्गत है. इसका निर्माण सर्वार्थचिन्तामणिकार वेंकटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ ने विक्रम सम्वत १४८२ में किया था. रचना मौलिक है किन्तुय इसमें श्रीपतिपद्धति, तरावली, सर्वार्थचिन्तामणि, बृहज्जातक तथा अन्य पूर्ववर्ती ग्रंथों का सार भी मिलता है. अठारह अध्यायों के इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में बाँट दिया गया है.
जातकपारिजातः प्रथम भाग
ज्योतिष के संहिता, होरा और सिद्धांत- इन तीन विषयों में प्रस्तुत कृति का स्थान होरा के अंतर्गत है. इसका निर्माण सर्वार्थचिन्तामणिकार वेंकटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ ने विक्रम सम्वत १४८२ में किया था. रचना मौलिक है किन्तुय इसमें श्रीपतिपद्धति, तरावली, सर्वार्थचिन्तामणि, बृहज्जातक तथा अन्य पूर्ववर्ती ग्रंथों का सार भी मिलता है. अठारह अध्यायों के इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में बाँट दिया गया है.
ज्ञानार्णवतंत्रम
ज्ञानार्णव तंत्र का प्रस्तुत संस्करण श्रीविद्या के उपासकों के समक्ष इदं प्रथमतया हिंदी के साथ प्रस्तुत है. प्रस्तुत संस्करण का मूल आनंदाश्रम के मुद्रित मूल पर आधारित है तथा अनेक स्थानों पर पाठों को मंत्रमहोदधि अदि अन्य ग्रंथों से मिलकर शुद्ध किया गया है. श्रीविद-विषयक अनेक ग्रन्थ सम्प्रदायानुसार प्राप्त होते हैं. इनके एक विवेचन आवश्यक है.