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ध्रुपद पञ्चाशिका

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पंडित ऋत्विक सान्याल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत (ध्रुपद ) के सुविख्यात ध्रुपद गायक हैं। वे विगत ३५ वर्षों से अनवरत देश-विदेश में ध्रुपद के पुनर्जागरण , प्रचार एवं प्रसार में सक्रिय हैं।

इस संस्करण में स्वयंकृत रचनायुक्त ५१ ध्रुपद हैं, जिनमे अनेक पद भी स्वरचित हैं।  अखण्ड आकार , कण , आंदोलन , बलाघात , मींड , गामक आदि को दर्शाते हुए रचनाओं को प्रस्तुत किया गया है , क्योंकि इन सभी का प्रयोग ध्रुपद की डगर-परंपरा में अतिशय ध्यानपूर्वक किया जाता है।

इस किताब की अहम् खासियत यह है की इसमें पंडित सान्याल ने केवल सुर-ताल-पद की नई बंदिशें ही नहीं दी हैं, बल्कि एक ऐसी नै स्वरलिपि (नोटेशन) भी ईजाद की है जो हमारी गायकी में स्वर के 'उच्चार' की खासियतों, खास अंदाज़ों, स्वरों की अनगिनत छटाओं को भी बहुत-कुछ उजागर कर सके. अभी तक जितने प्रकार की स्वरलिपियाँ बनीं और प्रयोग में लाई जा रही हैं, उनमें स्वर लगाने की बारीकियों को दिखाने लायक इतने संकेत-चिन्ह मौजूद नहीं हैं. उस कमी को महसूस करके पंडित सान्याल ने जो यह नई व बहुत बेहतरीन स्वरलिपि की उपज की है. यह स्वरलिपि अपने आप में संगीत जगत को एक बड़ी अहम् देन साबित होगा.

नंद -मौर्य युगीन भारत

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प्रस्तुत पुस्तक अंग्रेजी भाषा में लिखित "ऐज ऑफ़ दि नन्दाज एंड मौर्याज " का हिंदी रूपांतरण है. मूल पुस्तक के संपादक प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता आचार्य श्री नीलकंठ शास्त्री है जिन्होंने संपादन-कार्य के साथ-साथ इस ग्रन्थ के पांच अध्याय भी लिखे है. अन्य अध्यायों की रचना में सर्वश्री हेमचन्द्रराय चौधरी, जितेन्द्रनाथ बनर्जी, उपेन्द्रनाथ घोषाल, प्रबोधचंद्र बाग्ची , सुनिटिकुमार चटर्जी, वी राघवन, निहाररंजन रॉय इन आचार्यों के योगदान मिलता है.

नलचम्पूः

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Nalacampu or Damayanti Katha of Trivikrama Bhatta with 'Sudha' Sanskrit & Hindi Commentaries by Shri Pt. Parmeshwardin Pandey. Edited by Shri Rajendra Prasad Kothyari.

नारद पंचरात्र

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ग्रन्थ में राधिका को स्त्रीदेवताओं में उच्चतम स्थान दिया गया है. भगवान शिव राधा के सहस्रनाम के माहात्म्य की चर्चा

नेट संगीत Net Sangeet

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नेट, केंद्रीय विद्यालय, माध्यमिक एवं उत्तरमाध्यमिक स्तरों की विभिन्न परिच्छाओं हेतु उपयोगी

परलोक के खुलते रहस्य

300

परामनोविज्ञान, मनोविज्ञान और योगविज्ञान पर आधारित एक मौलिक आध्यात्मिक कृति।