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उत्तरतन्त्रशास्त्रम

425

वज्रयान का यह अत्यंत प्रसिद्ध उत्तरतन्त्रशास्त्रम ग्रन्थ है. यह ग्रन्थ प्रथमवार समग्र रूप में प्रकाशित हुआ है. इससे पहले इसके कुछ पटल ही रोमन लिपि में प्रकाशित हुए थे.

प्रस्तुत संस्करण हिंदी अनुवाद के साथ होने से भी हिंदी भाषी पाठकों के लिए तथा हिंदी समझने वाले विद्यार्थी एवं तंत्र साधकों के लिए नितांत उपयोगी होगा.

उदान (मूल पालि पाठ सहित )

250

उदान वायु यानी वह स्वास-वायु, जो हृदय से उठे और कण्ठ-तालू तक आकर मुंह से बाहर निकले |
इसी प्रकार उदान वचन यानी वह उदगार जो सीधे मन से उठे और वाणी द्वारा प्रकट हो जाए |
ऐसा उदगार शोकजन्य भी हो सकता है और हर्षजन्य भी | परन्तु पुरातन भाषा में सामान्यतः हर्षजन्य (हर्षद ) उदगार को ही उदान कहा गया है

कंकालमालिनीतंत्रम

100

भगवती काली ही कंकाल मालिनी हैं. कंकाल मालिनी का अर्थ ‘मुण्डमालिनी काली’ है. इस ग्रंथ के आद्यंत पाठ करने पर

कथक नृत्य शिक्षा (द्वितीय भाग)

500

इस पुस्तक की रचना भातखण्डे संगीत विद्यापीठ लखनऊ, गन्धर्व महाविद्यालय मंडल - मिरज , एवं प्राचीन कला केंद्र - चंडीगढ़ की विशारद, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय - खैरागढ़ की विद , प्रयाग संगीत समिति - इलाहाबाद की प्रभाकर, राजा मानसिंघ तोमर विश्वविद्यालय - ग्वालियर की विद व संगीत कला रत्न तथा उज्जैन, इंदौर, भोपाल, बड़ौदा, वाराणसी, चंडीगढ़, पटिआला, अमृतसर आदि विश्वविद्यालय की बी.ए परीक्षा के कत्थक नृत्य विषय के पाठ्यक्रमों का सामंजस्य कर की गयी है. स्नातक स्टार के समस्त पाठ्यक्रमों के लिए तो यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी ही स्नातकोत्तर स्टार के विद्यार्थियों का भी इससे समुचित लाभ होगा.

कथक नृत्य शिक्षा (प्रथम भाग)

300

इस पुस्तक की रचना भातखण्डे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ, गांधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ तथा राजा मानसिंह तोमर विश्विद्यालय, ग्वालियर की प्रथम एवं मध्यमा प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद की जूनियर व सीनियर डिप्लोमा प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ की नृत्य भूषण तथा उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश बोर्ड की हाई स्कूल व इंटरमीडिएट के कत्थक नृत्य के पाठ्यक्रम के अनुसार की गयी है. विभिन्न विश्वविद्यालयों के बी. ए (नृत्य) के पाठ्यक्रमों के लिए भी यह सामान रूप से उपयोगी है.

कश्मीर का क्रमदर्शन Kashmir Ka Kramadarshan

480

आगमों की भूमि ‘कश्मीर’ में एक शक्तिवादी मत का आविर्भाव हुआ जिसका अभिधान था-‘क्रमदर्शन’. इस दर्शन में शक्ति (कलसंकर्षिणि) को

कामसूत्रम

450

Kamasutram of Sri Vatsyayanamuni with the commentary Jayamangala by Sri Yasodhara. Edited with Manorama Hindi Commentary by Dr. Parasa Nath Dwivedi.

कालचक्रतन्त्रम (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)

375

श्री कालचक्रतंत्र का उपदेश यशस्वी राजा सुचन्द्र के प्रश्नों के बाद भगवन तथागत शाक्यमुनि ने किया है. इस ग्रन्थ का

कालंजयी

300

सन्त साधक कथा प्रसंग।