Showing 13–18 of 18 resultsSorted by price: low to high

विनयपिटके चुल्लवग्गपालि (हिन्दी अनुवाद सहित), The Chullavaggapali with Hindi Translation

1,600

विनयपिटक का यह महत्वपूर्ण चुल्लवग्गपालि ग्रन्थ १२ खन्धकों (अध्यायों ) में विभक्त है । इन में, आदि के दश खन्धकों में, भगवान बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को उपदिष्ट विनय (अनुशासन ) का वर्णन है।
शेष दो (११ एवं १२) में समय समय पर त्रिपिटक की प्रामाणिकता के हेतु भिक्षुओं द्वारा की गयी दो सङ्गीतियों (त्रिपिटक का अक्षरशः मूलपाठ निर्धारण ) का वर्णन है।

आचार्यवसुबन्धुविरचितम अभिधर्मकोशम(स्वोपज्ञभाष्यसहितं स्फुटार्थव्याख्योपेतं च ) प्रथमो तथा द्वितीयो भागः The Abhidharmakosha & Bhashya of Acarya Vasubandhu with Sphutartha Commentary of Acarya Yashomitra (2 vols.)

1,700

प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त बौद्ध दर्शन का मूल है। इस सिद्धान्त का सरलता से ज्ञान कराने हेतु भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं को अभिधर्मशास्त्र की देशना की थी।

सुत्तपिटके दीघनिकायपालि – ३ खण्डों में (१. सीलक्खन्धवग्गो २.महावग्गो ३.पाथिकवग्गो ) हिन्दी अनुवादसहित। The Dighanikayapali – in 3 volumes (1. Silakkhandha Vagga 2. Maha Vagga 3. Pathika Vagga) with Hindi translation.

2,500

दीघनिकाय ग्रन्थ में बुद्धाभिमत दर्शन के साथ यथाप्रसङ्ग तत्कालीन इतिहास, भूगोल,राजनीति एवं सामाजिक व्यवस्था भी भगवान बुद्ध के प्रवचनों में ओतप्रोत है।

मज्झिमनिकायपालि -३ खण्डों में (१ मूलपण्णासकं २. मज्झिमपण्णासकमिता ३ . उपरिपण्णासकमिता ) हिन्दीअनुवाद सहित। The Majjhimanikayapali (3 volumes with Hindi Translation)

3,000

मज्झिमनिकायपालि का  बर्मा देश (म्यांमार) में हुए छट्ठ संगायन पर आधृत और श्रीलङ्का ,श्याम (थाईलैंड ) तथा पालि टैक्सट सोसाइटी लन्दन के संस्करणों का सहयोग लेकर सन १९५६ -६१ में ' पालि त्रिपिटक प्रकाशन मण्डल ' नालन्दा से प्रकाशित देवनागरी -संस्करण एवं आचार्य श्रीबुद्धघोष की अट्ठकथा का सहारा लेकर, स्वतंत्र रूप से किया गया हिंदी रूपान्तर।

सुत्तपिटके अंगुत्तरनिकायपालि – ४. खण्डों में,(१. एकक-दुक-तिकनिपात २.चतुक्क -पंचकनिपात ३.षट्क-सप्तक-अष्टकनिपात ४. नवक-दशक-एकादशक निपात ) हिन्दी अनुवादसहित।,Anguttaranikayapali 4 vols. with Hidi Translation. (Copy)

4,200

इस ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं तथा जिज्ञासुओं को धर्म सम्बन्धी नियमों और आचारों का व्याख्यान आकर्षक शैली में किया है। इसमें गृहस्थों तथा श्रमणों के लिए पृथक पृथक अचार-नियमों का भी प्रतिपादन हुआ है।

सुत्तपिटके संयुक्तनिकायपालि (४ खण्डों में ) १. सगाथवग्गो २. निदानवग्गो ३. खन्धवग्गो ४.सलायतनवग्गो ५. महावग्गो (हिन्दी अनुवाद सहित), Samyuttanikayapali of Suttapita ( 4 vol. with Hindi translation) 1. Sagath Vagga 2. Nidana Vagga 3. Khandha Vagga Ch 4.Salayatana Vagga 5.Maha Vagga

4,200

संयुक्तनिकाय भगवान् बुद्ध के उपदिष्ट सूत्रों के संग्रह है।
समस्त सुत्तपिटक में दार्शनिक दृष्टि से संयुक्तनिकाय का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।