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पातिमोक्खसुत्त (भिक्खुपातिमोक्ख) हिंदी अनुवाद सहित ,The Pātimokkhasutta (Bhikkhupātimokkha) with Hindi translation

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बौद्ध-सङ्घ के लिए बुद्ध के मूल शिक्षापदों का संग्रह 'पातिमोक्खसुत्त' नाम से किया गया है। इस सुत्त को भी भिक्षु और भिक्षुणियों के लिए पृथक पृथक दो भागों में विभक्त किया गया -    १. भिक्खुपातिमोक्ख एवं २. भिक्खुनिपातिमोक्ख। इस पुस्तक में 'भिक्खुपातिमोक्ख' पर विचार किया गया है।

पालिव्याकरण (बालावतार) (हिन्दी अनुवाद सहित ), Pali Grammar (Balavatara) of Bhikkhu Dharmakitti with Hindi Translation

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पालि में लिखे गये जितने भी व्याकरण ग्रन्थ हैं, वे तीन परम्पराओं में विभक्त हैं। ये परम्पराएँ पालि-व्याकरणों के पठन-पाठन की अपनी परम्पराएँ हैं। ये परम्पराएँ हैं : १. कच्चान, २. मोग्गल्लान और ३.सद्द्नीति।
इसी कच्चान परंपरा के अन्तर्गत "बालावतार" है। "बालावतार" प्रारम्भिक पाठकों के लिए बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।

सुत्तपिटके खुद्दकनिकाये बुद्धवंसपालि (हिंदी अनुवादसहित ), The Buddhavansapali (Khuddakanikayapali) with Hindi Translation

500

स्वयं भगवान गौतम बुद्ध के मुखारविन्द से प्रथम बुद्ध से प्रारंभ कर अट्ठाइसवें बुद्ध तक के सभी २८ अवतारों का वर्णन पालि परम्परा के अनुसार से हुआ है। इसमें सभी बुद्धावतारों के परिचय के साथ उनका अवतारकाल, आयु ,जन्म ,जाति ,जन्म-स्थान ,माता, पिता, विवाह ,गृहाभिनिस्क्रमण, दुष्करचर्या, बोधिवृक्ष , बुद्वत्वप्राप्ति, धर्मचक्रप्रवर्तन, अग्रश्रावक,अग्रश्राविका,उपस्थापक, अग्रउपासक,अग्रउपासिका,अभिसमय,सन्तसमागम एवं उनका निर्वाणकाल भी वर्णित है।

सुत्तपिटके खुद्दकनिकाये धम्मपदपालि (हिन्दी-संस्कृत अनुवाद सहित) , The Dhammapadapali with Hindi & Sanskrit Translation.

500

धम्मपद ग्रन्थ का बौद्धों के हृदय में वही आदर, श्रद्धा तथा पूजा का भाव है जो किसी हिन्दू का वेद या गीता के प्रति तथा किसी ईसा-मतावलम्बी का बाइविल के प्रति, या किसी पारसी का अवेस्ता के प्रति होता है। विद्वानों में धम्मपद ग्रन्थ का साहित्यिक एवं धार्मिक,दोनों ही स्तरों पर समान महत्व माना गया है।

गुह्यसमाजतन्त्रम तथागतगुह्यकम (हिन्दी अनुवाद सहित ), GuhyaSamajTantra or Tathagataguhyaka

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तत्कालीन बौद्ध धर्मानुयायी मूल बौद्ध धर्म से संतुष्ट नहीं थे। वे बुद्धत्वप्राप्ति की एक ऐसी सरलतम चामत्कारिक निश्चित प्रक्रिया चाहते थे जिसके द्वारा इसी जीवन में या उससे भी पूर्व ही निर्वाण प्राप्त किया जा सके। गुह्यसमाज ग्रन्थ ने उनकी इस आकांक्षा को पूर्णतः संतुष्ट किया. इसी कारण यहाँ ग्रन्थ, अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।

महायानसूत्रालङ्कार: (आर्यमैत्रेयविरचितःअनेकविधसूची-पाठान्तरादिसंवलितः विज्ञानवादस्य प्रमुखो ग्रन्थः),Mahayanasutralankar by Aryamaitreya & Asanga

600

' महायानसूत्रालङ्कार ' विज्ञानवाद का सबसे प्रधान ग्रन्थ है। ' महायानसूत्रालङ्कार ' गुरु मैत्रयनाथ एवम उनके शिष्य आर्य असङ्गकी सम्मिलित कृति है। मूलभाग मैत्रेयनाथ का और टीकाभाग आर्य असङ्ग का कहा जाता है।

सुत्तपिटके खुद्दकनिकाये सुत्तनिपातपालि (हिन्दी-अनुवाद सहित ), The Suttanipatapali (khuddakanikayapali) with Hindi Translation.

600

बौद्धधर्म की परम्परा में सुत्तनिपातपालि उतना ही लोकप्रिय माना गया है जितना धम्मपदपालि ; मौलिक बौद्ध धर्म एवं बौद्ध साहित्य की दृष्टि से इस ग्रन्थरत्न का बुद्धकाल से ही उच्चतम स्थान माना जाता है।
सम्राट अशोक ने अपने भब्रुशिला लेख (बैराठ,जयपुर,राजस्थान ) में बुद्धोपदिष्ट जिन महत्वशाली सात सूत्रों का भिक्षुओं के लिये अनिवार्यरूप से प्रतिदिन स्वाध्याय घोषित किया है उन में से तीन प्रमुख सूत्र सुत्तनिपात ग्रन्थ से ही लिये गये हैं।

सुत्तपिटके खुद्दनिकाये विमानवत्थुपालि, पेतवत्थुपालि (हिन्दी अनुवादसहित) , The Vimanavatthupali Petavathupali (Khuddakanikayapali) with hindi Translation

600

बौद्ध धर्म में जनसाधारण के लिए जिस नीतिविधान का आदर्श रखा गया है उसी का दिग्दर्शन ये दोनों ग्रन्थ करते हैं जिनको बौद्ध धर्म में सद्गृहस्थों के लिये आदरणीय एवं ग्राह्य मन गया है।

सुत्तपिटके खुद्दनिकाये खुद्दकपाठपालि, उदानपालि, इतिवुत्तकपालि, चरियापिटकपालि (हिन्दी अनुवाद सहित ), The KhuddakaPatha, Udana, Itivuttaka & Cariyapitaka (KhuddakaNikayaPali) with Hindi Translation.

900

पालि के सर्वोत्तम काव्य-उद्धार खुद्दकनिकाय के ग्रंथों में सन्निहित है। और उनका प्रणयन मानवीय तत्वों के आधार पर चार निकायों के बाद हुआ है। उनमें से अनेक अत्यन्त प्रचीनयुग के भी है।
खुद्दकनिकाय का अधिकांश स्वरूप काव्यात्मक होते हुए भी उसकी मूल भावना सर्वांश में बौद्ध है। अपितु उसकी गाथाओं में अनेक तो पिटक -संकलन के प्राचीनतम युग के सूचक भी हैं।

सुत्तपिटके खुद्दकनिकाये थेरगाथापालि, थेरीगाथापालि (हिन्दी-अनुवादसहित ) The Theragathapali Therigathapali (Khuddakanikayapali) with Hindi Translation

900

थेरगाथा एवं थेरीगाथा -दोनों ही ग्रंथ, खुद्दकनिकाय में परिगणित १५ ग्रंथों में अतिशय महत्वपूर्ण है।आचार्य बुद्धघोष ने इन दोनों ग्रथों का खुद्दकनिकाय ग्रन्थसमूह में अष्ठम एवं नवम स्थान निर्धारित किया है। इन दोनों ग्रंथों में क्रमशः बुद्धकाल के भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के पद्य बद्ध जीवन-संस्मरण है। काव्यसाहित्य एवं दर्शन के दृष्टि से इन दोनों ग्रंथों का स्थान धम्मपद एवं सुत्तनिपात के बाद ही है।

मिलिन्दपञ्हपालि Milindapanha Pali ( Qustions of Milinda )

1,200

मिलिन्दपञ्हपालि में, पालि साहित्य के पालि -त्रिपिटक से नाना ग्रंथों के नाम देकर पाँच निकायों,  अभिधम्मपिटक के सात ग्रंथों और उनके भिन्न-भिन्न अंगों के निर्देशपूर्वक अनेक अंश उद्धृत किये गये हैं

महावग्गपालि ( मूल पालि एवं हिंदी अनुवाद सहित ) The Mahavaggapali ( Pali Text with Hindi Translation )

1,600

भगवान बुद्ध के प्रवचन काल (पैंतालीस वर्षों ) में उनका अमूल्य उपदेशसंग्रह विषय - विभाजन करते हुए, इसे तीन भागों में संग्रह किया गया । यह संग्रह त्रिपिटक कहलाया ये तीन पिटक हैं - १. विनय पिटक २.सुत्तपिटक ३.अभिधम्मपिटक