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भारतीय कला

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भारतीय कला और वास्तु के सम्बन्ध में कई इतिहास ग्रन्थ पहले लिखे जा चुके है. फेर्गुसन, स्मिथ, कुमारस्वामी और परसी ब्राउन के लिखे हुए ग्रन्थ विशिष्ट हैं और आज भी उनका सम्मान है. किन्तु अधिकांश वर्णनात्मक है और उनमें कला के अर्थों पर विचार प्रायः नहीं है. उनमें स्थापत्य और शिल्प का विचार अलग-अलग किया गया है. किन्तु भारतीय कला के इस नए इतिहास में विद्वान् लेखक ने स्थापत्य और शिल्प दोनों का संयुक्त अध्ययन किया है जैसे कला निर्माताओं ने अपने ध्यान में उनकी एक साथ कल्पना की थी. बाह्य वर्णन ही नहीं, उसके साथ उनके भीतरी अर्थ पर विचार भी है, जिससे वस्तुतः वे कला-कृतियां अस्तित्व में आई थीं. इनके अतिरिक्त संस्कृत संस्कृत, पाली, प्राकृत अदि भाषाओँ की मूल शब्दावली का भी बहुशः उपयोग है जिससे इस बात का परिचय मिलता है की वास्तु और शिल्प के निर्माता और जनता उन्हें किन नामों से जानते थे.

भारतीय संगीत का इतिहास

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प्रस्तुत ग्रन्थ भारतीय संगीत का इतिहास अपने आप में असाधारण शोध-ग्रन्थ है. इसके लेखक डॉक्टर ठाकुर जयदेव सिंह बहु-आयामी व्यक्तित्व के विद्वान् थे. संगीतशास्त्र की सुविख्यात विदुषी प्रोफ. प्रेमलता शर्मा द्वारा सम्पादित इस ग्रन्थ को कोलकाता की संगीत रिसर्च अकादमी ने सन `१९९४ ईस्वी में संगीत परिदर्शिनी ग्रंथमाला के प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित किया था. भारतीय संगीत क्षेत्र का अपने ढंग का पहला अनूठा ग्रन्थ है.

भ्रमर-गीत

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प्रस्तुत पुस्तक “भ्रमर गीत” की संकलयित्री श्रीमती पद्मावती झुनझुनवाला महाराज के शरण में आयी. उनके शरण में आते ही इस

मज्झिमनिकायपालि -३ खण्डों में (१ मूलपण्णासकं २. मज्झिमपण्णासकमिता ३ . उपरिपण्णासकमिता ) हिन्दीअनुवाद सहित। The Majjhimanikayapali (3 volumes with Hindi Translation)

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मज्झिमनिकायपालि का  बर्मा देश (म्यांमार) में हुए छट्ठ संगायन पर आधृत और श्रीलङ्का ,श्याम (थाईलैंड ) तथा पालि टैक्सट सोसाइटी लन्दन के संस्करणों का सहयोग लेकर सन १९५६ -६१ में ' पालि त्रिपिटक प्रकाशन मण्डल ' नालन्दा से प्रकाशित देवनागरी -संस्करण एवं आचार्य श्रीबुद्धघोष की अट्ठकथा का सहारा लेकर, स्वतंत्र रूप से किया गया हिंदी रूपान्तर।

मदनमोहन मालवीय का दर्शन

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित प्रस्तुत ग्रन्थ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के बहुआयामी व्यक्तित्व तथा वैचारिकी के समन्वित कलेवर में गुम्फित मालवीय-दर्शन के सुधि अध्येता एवं साधक प्रोफ. डॉ देवव्रत चौबे के प्रेरणास्पद तथा गंभीर व्याख्यानों का अभूतपूर्व संग्रह है.