The World As Power

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There is a Supreme Reality which is Eternal and Indefinable. It is an Absolute, inconceivable and ineffable-The Brahman. Unknowable in its utterness, this Reality presents itself to us in three supreme terms of its truth : an absolute Existence, Sat; an absolute Consciousness, Cit; and an absolute Bliss, Ananda. This is the poise of Brahman turned towards self-revelation.

कंकालमालिनीतंत्रम

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भगवती काली ही कंकाल मालिनी हैं. कंकाल मालिनी का अर्थ ‘मुण्डमालिनी काली’ है. इस ग्रंथ के आद्यंत पाठ करने पर

ज्ञानार्णवतंत्रम

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ज्ञानार्णव तंत्र का प्रस्तुत संस्करण श्रीविद्या के उपासकों के समक्ष इदं प्रथमतया हिंदी के साथ प्रस्तुत है. प्रस्तुत संस्करण का मूल आनंदाश्रम के मुद्रित मूल पर आधारित है तथा अनेक स्थानों पर पाठों को मंत्रमहोदधि अदि अन्य ग्रंथों से मिलकर शुद्ध किया गया है. श्रीविद-विषयक अनेक ग्रन्थ सम्प्रदायानुसार प्राप्त होते हैं. इनके एक विवेचन आवश्यक है.

नारद पंचरात्र

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ग्रन्थ में राधिका को स्त्रीदेवताओं में उच्चतम स्थान दिया गया है. भगवान शिव राधा के सहस्रनाम के माहात्म्य की चर्चा

योगिनीहृदयम

295
योगिनीह्रदयम भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अंतर वरिवस्या का प्रतिपादक ग्रन्थ है. इसमें तीन पटल हैं: चक्रसंकेत, मन्त्रसङ्केत और पूजासंकेत. प्रथम पटल में भगवती के अवतार-स्थान श्रीचक्र का आध्यात्मिक स्वरुप प्रदर्शित किया गया है की किस प्रकार विसटीर्ना तत्त्व विश्वमय बन जाता है. शक्ति के अम्बिकादि तथा शान्तादि चार प्रकारों, वाणी के पारा आदि चार भेड़ों, चार पीठों, चार लिंगों, संख्या-सम्मत २५ तत्त्वों तथा समस्त

रुद्रयामलम उत्तरतन्त्रम

600
'रुद्रयामल उत्तरतंत्र: सिद्धांत, साधना एवं रहस्य' कई दृष्टिकोण से अनूठी कृति है. तंत्र जैसे गुह्य विषय पर भ्रान्ति और पाखंड का निराकरण करते हुए विज्ञानं सम्मत प्रमाणिकता का उद्घोष इस पुस्तक की सबसे बरी विशेषता है.

श्रीनीलतन्त्रम

150
निलादेवी दसमहा विद्याओं में अन्यतम द्वितीय महाविद्या तारा देवी का ही रूपभेद मात्रा हैं. प्रत्येक महाविद्या ही एक अखण्ड महाविद्या

श्रीप्रपञ्चसारतंत्रम (1-2 भाग)

1,500
मूलतः आचार्य शंकर तांत्रिक थे और श्रीविद्यार्णव के रचयिता श्रीविद्यारण्य के अनुसार लोक में प्रचलित तमाम तांत्रिक-पद्धतियां शंकर से बहार नहीं. तांत्रिक प्रयोगों से लोक का कल्याण हो इसीलिए उन्होंने 'प्रपंचसारतंत्र' की रचना की और शंकर शिष्य पदमपाद ने इस पर 'विवरण' लिखा. बाद में श्री लक्ष्मणदेशिक, श्रीराघवभट्ट, श्रीविद्यारण्य तथा श्रीगिरवणेन्द्र सरस्वती जैसे तंत्रज्ञ विद्यानों ने शंकर की तांत्रिक विरासत को और भी समृद्ध किया.