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वैदिक संस्कृति

999

भारतीय परंपरा में वेद को अनादि अथवा ईश्वरीय मन गया है. इतिहास और संस्कृति के विद्यार्थी के लिए इनमें भारतीय

वैरागी

300

नारी अन्तर्मन पर आधारित आध्यात्मिक कथा प्रसंग।

शिव-संबोध और गंगा-प्रतीक

195

रचनाकार ने शिव को एक ‘अद्भुत देवता’ के रूप में प्रस्तुत किया है. दूर से लगता है कोई देव-पुरुष है,

शिवयोगीशिवाचार्यविरचितः श्रीसिद्धान्तशिखामणिः

600

Srisiddhantasikhamanih of Sivayogi Sivacarya with Tattvapradipika Sanskrta Commentary By Sri Maritontadarya & Jnanavati Hindi commentary by Dr. Radheshyam Chaturvedi.

श्री रमण महर्षि का उपदेश (HB)

595
श्री रमण महर्षि भारतवर्ष के सबसे अधिक वंदनीय एवं लोकप्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शक सदगुरुओं में से एक हैं, जिनका सीधा-सदा सन्देश है: अपनी सहज स्थिति में रहिये। उनकी महासमाधि के पचास से अधिक वर्ष बाद उनका ह्रदय स्पर्शी उपदेश दुनियाभर के निरंतर बढ़नेवाले जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन कर रहा है।
 श्री महर्षि ने उदघोषित किया था : अपनी नित्य, स्वाभाविक, निर्विचार अवस्था में रहिये, इससे अधिक कुछ भी कहने की आवस्यकता नहीं है। सत्य तो यह है की उनका सर्वोच्च उपदेश सुक्ष्म ग्रहणशक्तिवाले, पक्वचित्त जिज्ञासुओं को मौन में दिया जाता था, जिसके दौरान वे अपनी शक्ति के प्रवाह को उनके सम्मुख बैठे हुए मनुष्यों में संक्रमित करके, जिसमें वे निरंतर प्रतिष्ठित रहते थे, उस मुक्ति की अवस्था का सीधा प्रदान करते थे।

श्री रमण महर्षि का उपदेश (PB)

495

श्री रमण महर्षि भारतवर्ष के सबसे अधिक वंदनीय एवं लोकप्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शक सदगुरुओं में से एक हैं, जिनका सीधा-सदा सन्देश

श्री श्री परात्रिंशिका

950

'श्री श्री पारात्रिंशिका' मूलरूप से कश्मीर के अद्वैत त्रिक्दर्शन के मुख्या तंत्रग्रंथ 'श्रीरुद्रयामलतन्त्र' से उद्धृत ३५ श्लोकों का एक छोटा संग्रह है. यह संग्रह पश्यन्ति भूमिका पर उत्तर कर अपने ही बहिर्मुखीन शकताप्रसार का रहस्य समझने की कामना से शिष्य के रूप में प्रस्ता पूछने वाली भगवती परभैरवी 'पराभट्टारिका' और पराभव पर ही अवस्थित रहकर गुरु के रुऊप में उसके प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करने वाले उत्तरदाता 'परभैरव' का पारस्परिक संवाद है. यह एक बृहत्काय शारदा मूल-पुस्ति है जिसका अंतिम भाग श्री पारात्रिंशिका है. पूर्व भाग आचार्य अभिनव द्वारा रचित 'श्री तंत्रसार' तंत्रग्रंथ है.

श्रीनीलतन्त्रम

150

निलादेवी दसमहा विद्याओं में अन्यतम द्वितीय महाविद्या तारा देवी का ही रूपभेद मात्रा हैं. प्रत्येक महाविद्या ही एक अखण्ड महाविद्या

श्रीप्रपञ्चसारतंत्रम (1-2 भाग)

1,500

मूलतः आचार्य शंकर तांत्रिक थे और श्रीविद्यार्णव के रचयिता श्रीविद्यारण्य के अनुसार लोक में प्रचलित तमाम तांत्रिक-पद्धतियां शंकर से बहार नहीं. तांत्रिक प्रयोगों से लोक का कल्याण हो इसीलिए उन्होंने 'प्रपंचसारतंत्र' की रचना की और शंकर शिष्य पदमपाद ने इस पर 'विवरण' लिखा. बाद में श्री लक्ष्मणदेशिक, श्रीराघवभट्ट, श्रीविद्यारण्य तथा श्रीगिरवणेन्द्र सरस्वती जैसे तंत्रज्ञ विद्यानों ने शंकर की तांत्रिक विरासत को और भी समृद्ध किया.