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भरतनाट्यम शिक्षा (प्रथम भाग)

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इस पुस्तक की रचना भातखण्डे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ, गन्धर्व महाविद्यालय मंडल, मिराज एवं इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की प्रवेशिका, प्रथम एवं मध्यमा प्रयाग संगीत समिति, इलाहबाद की जूनियर व सीनियर डिप्लोमा प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ की नृत्य भूषण तथा उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश बोर्ड की हाई स्कूल व इंटरमीडिएट के भरतनाट्यम के पाठ्यक्रम के अनुसार की गयी है. विभिन्न विश्वविद्यालयों के बी ए (नृत्य) के पाठ्यक्रमों के लिए भी यह समान रूप से उपयोगी है.

भारतीय कला

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भारतीय कला और वास्तु के सम्बन्ध में कई इतिहास ग्रन्थ पहले लिखे जा चुके है. फेर्गुसन, स्मिथ, कुमारस्वामी और परसी ब्राउन के लिखे हुए ग्रन्थ विशिष्ट हैं और आज भी उनका सम्मान है. किन्तु अधिकांश वर्णनात्मक है और उनमें कला के अर्थों पर विचार प्रायः नहीं है. उनमें स्थापत्य और शिल्प का विचार अलग-अलग किया गया है. किन्तु भारतीय कला के इस नए इतिहास में विद्वान् लेखक ने स्थापत्य और शिल्प दोनों का संयुक्त अध्ययन किया है जैसे कला निर्माताओं ने अपने ध्यान में उनकी एक साथ कल्पना की थी. बाह्य वर्णन ही नहीं, उसके साथ उनके भीतरी अर्थ पर विचार भी है, जिससे वस्तुतः वे कला-कृतियां अस्तित्व में आई थीं. इनके अतिरिक्त संस्कृत संस्कृत, पाली, प्राकृत अदि भाषाओँ की मूल शब्दावली का भी बहुशः उपयोग है जिससे इस बात का परिचय मिलता है की वास्तु और शिल्प के निर्माता और जनता उन्हें किन नामों से जानते थे.

भारतीय संगीत का इतिहास

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प्रस्तुत ग्रन्थ भारतीय संगीत का इतिहास अपने आप में असाधारण शोध-ग्रन्थ है. इसके लेखक डॉक्टर ठाकुर जयदेव सिंह बहु-आयामी व्यक्तित्व के विद्वान् थे. संगीतशास्त्र की सुविख्यात विदुषी प्रोफ. प्रेमलता शर्मा द्वारा सम्पादित इस ग्रन्थ को कोलकाता की संगीत रिसर्च अकादमी ने सन `१९९४ ईस्वी में संगीत परिदर्शिनी ग्रंथमाला के प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित किया था. भारतीय संगीत क्षेत्र का अपने ढंग का पहला अनूठा ग्रन्थ है.

भ्रमर-गीत

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प्रस्तुत पुस्तक “भ्रमर गीत” की संकलयित्री श्रीमती पद्मावती झुनझुनवाला महाराज के शरण में आयी. उनके शरण में आते ही इस

मदनमोहन मालवीय का दर्शन

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित प्रस्तुत ग्रन्थ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के बहुआयामी व्यक्तित्व तथा वैचारिकी के समन्वित कलेवर में गुम्फित मालवीय-दर्शन के सुधि अध्येता एवं साधक प्रोफ. डॉ देवव्रत चौबे के प्रेरणास्पद तथा गंभीर व्याख्यानों का अभूतपूर्व संग्रह है.

मनीषी की लोकयात्रा

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कविराज जी के दार्शनिक चिंतन और कृतित्व से भारतीय संस्कृति तथा साहित्य अनेक विध समृद्ध हुआ है. वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय (पूर्व गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज, बनारस) और उसका विश्वप्रसिद्ध 'सरस्वती-भवन' विविध रूपों में उनके द्वारा की गयी सेवाओं से ही वर्त्तमान स्थिति प्राप्त करने में समर्थ हुआ. यह हिंदी-भाषी क्षेत्र का सौभाग्य था की पूर्वी बंगाल में जन्मा ग्रहण करते हुए भी इस महापुरुष की शिक्षा-दीक्षा और साधना भूमि होने का गौरव उसे प्राप्त हुआ. भौतिक दृष्टि से जन्मभूमि के आकर्षक एवं उत्कर्षविधायक प्रलोभनों तथा दबाओं के बावजूद इनकी काशिनिष्ठा ढृढ़ रही और वही आजीवन इनकी क्षेत्र-संन्यास-स्थली बानी रही. इनका अपना विशीष्ट क्षेत्र दर्शन, भक्तिसाधना तथा तंत्र था. इन विषयों पर पिछले पचास वर्षों में निर्मित हिंदी साहित्य के वे प्रमुख प्रेरणास्रोत रहे हैं.