श्री श्री परात्रिंशिका

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'श्री श्री पारात्रिंशिका' मूलरूप से कश्मीर के अद्वैत त्रिक्दर्शन के मुख्या तंत्रग्रंथ 'श्रीरुद्रयामलतन्त्र' से उद्धृत ३५ श्लोकों का एक छोटा संग्रह है. यह संग्रह पश्यन्ति भूमिका पर उत्तर कर अपने ही बहिर्मुखीन शकताप्रसार का रहस्य समझने की कामना से शिष्य के रूप में प्रस्ता पूछने वाली भगवती परभैरवी 'पराभट्टारिका' और पराभव पर ही अवस्थित रहकर गुरु के रुऊप में उसके प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करने वाले उत्तरदाता 'परभैरव' का पारस्परिक संवाद है. यह एक बृहत्काय शारदा मूल-पुस्ति है जिसका अंतिम भाग श्री पारात्रिंशिका है. पूर्व भाग आचार्य अभिनव द्वारा रचित 'श्री तंत्रसार' तंत्रग्रंथ है.

श्रीचण्डमहारोषणतन्त्रम (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)

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वज्रयान का यह अत्यंत प्रसिद्ध श्रीचण्ड महारोशण तंत्र  ग्रन्थ है. यह ग्रन्थ प्रथमवार समग्र रूप में प्रकाशित हुआ है. इससे

श्रीनीलतन्त्रम

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निलादेवी दसमहा विद्याओं में अन्यतम द्वितीय महाविद्या तारा देवी का ही रूपभेद मात्रा हैं. प्रत्येक महाविद्या ही एक अखण्ड महाविद्या

श्रीप्रपञ्चसारतंत्रम (1-2 भाग)

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मूलतः आचार्य शंकर तांत्रिक थे और श्रीविद्यार्णव के रचयिता श्रीविद्यारण्य के अनुसार लोक में प्रचलित तमाम तांत्रिक-पद्धतियां शंकर से बहार नहीं. तांत्रिक प्रयोगों से लोक का कल्याण हो इसीलिए उन्होंने 'प्रपंचसारतंत्र' की रचना की और शंकर शिष्य पदमपाद ने इस पर 'विवरण' लिखा. बाद में श्री लक्ष्मणदेशिक, श्रीराघवभट्ट, श्रीविद्यारण्य तथा श्रीगिरवणेन्द्र सरस्वती जैसे तंत्रज्ञ विद्यानों ने शंकर की तांत्रिक विरासत को और भी समृद्ध किया.

हिन्दी मंत्रमहार्णव (देवता खंड)

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इस मंत्रशास्त्र के ही प्रभाव से प्राचीनकाल में मनुष्य न केवन देवताओं पर विजय प्राप्त करने में सफल होता था,

हिन्दी मंत्रमहार्णव (देवी खण्ड )

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मंत्रशास्त्र की प्रत्येक पुस्तक में लिखा है की पुस्तक में लिखा मंत्र निष्प्रभावी होता है क्योंकि प्रत्येक मंत्र को जागृत

हिन्दी मंत्रमहार्णव (मिश्र खण्ड )

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इस पुस्तक में मुख्यत – षट्कर्मों, यक्षिणियों, चेटकों तथा अनन्य काम्यकर्मों और कौतुकों आदि से संबंध विस्तृत और प्रामाणिक वर्णन