Where the Buddha Walked A Companion to the Buddhist Places of India (HB)

695

This book is the first attempt to describe all the fifteen places with which the Buddhs had direct association: Lumbini,

Where the Buddha Walked A Companion to the Buddhist Places of India (PB)

495

This book is the first attempt to describe all the fifteen places with which the Buddhs had direct association: Lumbini,

Yajurveda Samhita (Sanskrit Text with English Translation)

500

Sanskrit Text with English Translation of R.T.H. Griffith. Edited and revised with an introduction and exegical notes by Ravi Prakash

ताओ ते चिंग

325

चीन के अतिप्राचीन ताओवाद सम्प्रदाय के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ, यह ताओ ते चिंग पहली बार के लिए हिन्दी

ध्रुपद पञ्चाशिका

375

पंडित ऋत्विक सान्याल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत (ध्रुपद ) के सुविख्यात ध्रुपद गायक हैं। वे विगत ३५ वर्षों से अनवरत देश-विदेश में ध्रुपद के पुनर्जागरण , प्रचार एवं प्रसार में सक्रिय हैं।

इस संस्करण में स्वयंकृत रचनायुक्त ५१ ध्रुपद हैं, जिनमे अनेक पद भी स्वरचित हैं।  अखण्ड आकार , कण , आंदोलन , बलाघात , मींड , गामक आदि को दर्शाते हुए रचनाओं को प्रस्तुत किया गया है , क्योंकि इन सभी का प्रयोग ध्रुपद की डगर-परंपरा में अतिशय ध्यानपूर्वक किया जाता है।

इस किताब की अहम् खासियत यह है की इसमें पंडित सान्याल ने केवल सुर-ताल-पद की नई बंदिशें ही नहीं दी हैं, बल्कि एक ऐसी नै स्वरलिपि (नोटेशन) भी ईजाद की है जो हमारी गायकी में स्वर के 'उच्चार' की खासियतों, खास अंदाज़ों, स्वरों की अनगिनत छटाओं को भी बहुत-कुछ उजागर कर सके. अभी तक जितने प्रकार की स्वरलिपियाँ बनीं और प्रयोग में लाई जा रही हैं, उनमें स्वर लगाने की बारीकियों को दिखाने लायक इतने संकेत-चिन्ह मौजूद नहीं हैं. उस कमी को महसूस करके पंडित सान्याल ने जो यह नई व बहुत बेहतरीन स्वरलिपि की उपज की है. यह स्वरलिपि अपने आप में संगीत जगत को एक बड़ी अहम् देन साबित होगा.

शिव-संबोध और गंगा-प्रतीक

195

रचनाकार ने शिव को एक ‘अद्भुत देवता’ के रूप में प्रस्तुत किया है. दूर से लगता है कोई देव-पुरुष है,

श्री रमण महर्षि का उपदेश (HB)

595
श्री रमण महर्षि भारतवर्ष के सबसे अधिक वंदनीय एवं लोकप्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शक सदगुरुओं में से एक हैं, जिनका सीधा-सदा सन्देश है: अपनी सहज स्थिति में रहिये। उनकी महासमाधि के पचास से अधिक वर्ष बाद उनका ह्रदय स्पर्शी उपदेश दुनियाभर के निरंतर बढ़नेवाले जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन कर रहा है।
 श्री महर्षि ने उदघोषित किया था : अपनी नित्य, स्वाभाविक, निर्विचार अवस्था में रहिये, इससे अधिक कुछ भी कहने की आवस्यकता नहीं है। सत्य तो यह है की उनका सर्वोच्च उपदेश सुक्ष्म ग्रहणशक्तिवाले, पक्वचित्त जिज्ञासुओं को मौन में दिया जाता था, जिसके दौरान वे अपनी शक्ति के प्रवाह को उनके सम्मुख बैठे हुए मनुष्यों में संक्रमित करके, जिसमें वे निरंतर प्रतिष्ठित रहते थे, उस मुक्ति की अवस्था का सीधा प्रदान करते थे।

श्री रमण महर्षि का उपदेश (PB)

495

श्री रमण महर्षि भारतवर्ष के सबसे अधिक वंदनीय एवं लोकप्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शक सदगुरुओं में से एक हैं, जिनका सीधा-सदा सन्देश