Showing 601–612 of 625 resultsSorted by popularity

श्री श्री परात्रिंशिका

950

'श्री श्री पारात्रिंशिका' मूलरूप से कश्मीर के अद्वैत त्रिक्दर्शन के मुख्या तंत्रग्रंथ 'श्रीरुद्रयामलतन्त्र' से उद्धृत ३५ श्लोकों का एक छोटा संग्रह है. यह संग्रह पश्यन्ति भूमिका पर उत्तर कर अपने ही बहिर्मुखीन शकताप्रसार का रहस्य समझने की कामना से शिष्य के रूप में प्रस्ता पूछने वाली भगवती परभैरवी 'पराभट्टारिका' और पराभव पर ही अवस्थित रहकर गुरु के रुऊप में उसके प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करने वाले उत्तरदाता 'परभैरव' का पारस्परिक संवाद है. यह एक बृहत्काय शारदा मूल-पुस्ति है जिसका अंतिम भाग श्री पारात्रिंशिका है. पूर्व भाग आचार्य अभिनव द्वारा रचित 'श्री तंत्रसार' तंत्रग्रंथ है.

धर्मों और संस्कृतियों का संघर्ष

150

पंडित व्रज वल्लभ द्विवेदी जी का यह ग्रन्थ उनके चुने हुए निबंधों का एक संग्रह है. उनमें “धर्मों और संस्कृतियों

Makutagama

150

The special features of the ‘Pancasutra linga, the rites of Sannidhanam, Avagunthanam, Sakalikarana, Amritkarana etc. have also been narated as

सिद्धान्तप्रकाशिका सर्वात्मशंभुना विरचिता भाषानुवाद-टिप्पणीसहिता

100

श्री सर्वात्मसम्भु इस ग्रन्थ के रचयिता हैं. संपादक के विचार से सर्वात्मासीवा और सर्वात्मसम्भु में कोई  भेद नहीं है. दोनों

अनुभवसूत्रम श्रीमायीदेवकृतम

200

प्रस्तुत अनुभवसूत्र ग्रन्थ में श्री मायीदेव ने षटस्थलीसिद्धांत का बहुत सुन्दर विवेचन किया है. श्रद्धा, निष्ठा , अवधान, अनुभव, आनंद

शिवयोगीशिवाचार्यविरचितः श्रीसिद्धान्तशिखामणिः

600

Srisiddhantasikhamanih of Sivayogi Sivacarya with Tattvapradipika Sanskrta Commentary By Sri Maritontadarya & Jnanavati Hindi commentary by Dr. Radheshyam Chaturvedi.

Paramesvaragamah

700

In the history of Tantric literature, ten Saivagamas and eighteen Rudragamas have been recognised. Pauskar Agama maintains that all the

अमरकोषः

225

Amarakosa (Namalinganusasana) of Amarasimha. Edited with notes and the 'Maniprabha' Hindi commentary  by Pt. Haragovinda Sastri.

वैदिक संस्कृति

999

भारतीय परंपरा में वेद को अनादि अथवा ईश्वरीय मन गया है. इतिहास और संस्कृति के विद्यार्थी के लिए इनमें भारतीय

संस्कृत-व्याकरण एवं लघुसिद्धान्तकौमुदी

275

संस्कृत-व्याकरण का संशोधित एवं परिवर्धित पंचम संस्करण पाठकों के हाथों में देते हुए हरदिन प्रसन्नता हो रही है. संपूर्ण भारत