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चन्द्रज्ञानागमः (क्रिया-चर्यापादौ) भाषानुवाद -टिप्पणीसहितः

200

Candrajananagamah KriyaCandrajananagamah Kriya-Caryapadau Translation with Notes. Edited by Pt. Vrajavallabha Dwivedi. -Caryapadau Translation with Notes. Edited by Pt. Vrajavallabha Dwivedi.

जातकपारिजातः द्वितीय भाग

400

ज्योतिष के संहिता, होरा और सिद्धांत- इन तीन विषयों में प्रस्तुत कृति का स्थान होरा के अंतर्गत है. इसका निर्माण सर्वार्थचिन्तामणिकार वेंकटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ ने विक्रम सम्वत १४८२ में किया था. रचना मौलिक है किन्तुय इसमें श्रीपतिपद्धति, तरावली, सर्वार्थचिन्तामणि, बृहज्जातक तथा अन्य पूर्ववर्ती ग्रंथों का सार भी मिलता है. अठारह अध्यायों के इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में बाँट दिया गया है.

जातकपारिजातः प्रथम भाग

450

ज्योतिष के संहिता, होरा और सिद्धांत- इन तीन विषयों में प्रस्तुत कृति का स्थान होरा के अंतर्गत है. इसका निर्माण सर्वार्थचिन्तामणिकार वेंकटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ ने विक्रम सम्वत १४८२ में किया था. रचना मौलिक है किन्तुय इसमें श्रीपतिपद्धति, तरावली, सर्वार्थचिन्तामणि, बृहज्जातक तथा अन्य पूर्ववर्ती ग्रंथों का सार भी मिलता है. अठारह अध्यायों के इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में बाँट दिया गया है.

ज्ञानार्णवतंत्रम

275

ज्ञानार्णव तंत्र का प्रस्तुत संस्करण श्रीविद्या के उपासकों के समक्ष इदं प्रथमतया हिंदी के साथ प्रस्तुत है. प्रस्तुत संस्करण का मूल आनंदाश्रम के मुद्रित मूल पर आधारित है तथा अनेक स्थानों पर पाठों को मंत्रमहोदधि अदि अन्य ग्रंथों से मिलकर शुद्ध किया गया है. श्रीविद-विषयक अनेक ग्रन्थ सम्प्रदायानुसार प्राप्त होते हैं. इनके एक विवेचन आवश्यक है.

तन्त्रम

350

तंत्र के दर्शन पक्ष, ज्ञान पक्ष और क्रिया पक्ष के समन्वय पर आधारित खोजपूर्ण उपयोगी विषयो का ज्ञानवर्धक अपूर्व और अद्धभुत तंत्र संकलन।

ताओ ते चिंग

325

चीन के अतिप्राचीन ताओवाद सम्प्रदाय के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ, यह ताओ ते चिंग पहली बार के लिए हिन्दी

धर्मों और संस्कृतियों का संघर्ष

150

पंडित व्रज वल्लभ द्विवेदी जी का यह ग्रन्थ उनके चुने हुए निबंधों का एक संग्रह है. उनमें “धर्मों और संस्कृतियों

ध्रुपद पञ्चाशिका

375

पंडित ऋत्विक सान्याल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत (ध्रुपद ) के सुविख्यात ध्रुपद गायक हैं। वे विगत ३५ वर्षों से अनवरत देश-विदेश में ध्रुपद के पुनर्जागरण , प्रचार एवं प्रसार में सक्रिय हैं।

इस संस्करण में स्वयंकृत रचनायुक्त ५१ ध्रुपद हैं, जिनमे अनेक पद भी स्वरचित हैं।  अखण्ड आकार , कण , आंदोलन , बलाघात , मींड , गामक आदि को दर्शाते हुए रचनाओं को प्रस्तुत किया गया है , क्योंकि इन सभी का प्रयोग ध्रुपद की डगर-परंपरा में अतिशय ध्यानपूर्वक किया जाता है।

इस किताब की अहम् खासियत यह है की इसमें पंडित सान्याल ने केवल सुर-ताल-पद की नई बंदिशें ही नहीं दी हैं, बल्कि एक ऐसी नै स्वरलिपि (नोटेशन) भी ईजाद की है जो हमारी गायकी में स्वर के 'उच्चार' की खासियतों, खास अंदाज़ों, स्वरों की अनगिनत छटाओं को भी बहुत-कुछ उजागर कर सके. अभी तक जितने प्रकार की स्वरलिपियाँ बनीं और प्रयोग में लाई जा रही हैं, उनमें स्वर लगाने की बारीकियों को दिखाने लायक इतने संकेत-चिन्ह मौजूद नहीं हैं. उस कमी को महसूस करके पंडित सान्याल ने जो यह नई व बहुत बेहतरीन स्वरलिपि की उपज की है. यह स्वरलिपि अपने आप में संगीत जगत को एक बड़ी अहम् देन साबित होगा.

नंद -मौर्य युगीन भारत

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प्रस्तुत पुस्तक अंग्रेजी भाषा में लिखित "ऐज ऑफ़ दि नन्दाज एंड मौर्याज " का हिंदी रूपांतरण है. मूल पुस्तक के संपादक प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता आचार्य श्री नीलकंठ शास्त्री है जिन्होंने संपादन-कार्य के साथ-साथ इस ग्रन्थ के पांच अध्याय भी लिखे है. अन्य अध्यायों की रचना में सर्वश्री हेमचन्द्रराय चौधरी, जितेन्द्रनाथ बनर्जी, उपेन्द्रनाथ घोषाल, प्रबोधचंद्र बाग्ची , सुनिटिकुमार चटर्जी, वी राघवन, निहाररंजन रॉय इन आचार्यों के योगदान मिलता है.