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कंकालमालिनीतंत्रम
रुद्रयामलम उत्तरतन्त्रम
On the Meaning of the Mahabharata
योगिनीहृदयम
योगिनीह्रदयम भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अंतर वरिवस्या का प्रतिपादक ग्रन्थ है. इसमें तीन पटल हैं: चक्रसंकेत, मन्त्रसङ्केत और पूजासंकेत. प्रथम पटल में भगवती के अवतार-स्थान श्रीचक्र का आध्यात्मिक स्वरुप प्रदर्शित किया गया है की किस प्रकार विसटीर्ना तत्त्व विश्वमय बन जाता है. शक्ति के अम्बिकादि तथा शान्तादि चार प्रकारों, वाणी के पारा आदि चार भेड़ों, चार पीठों, चार लिंगों, संख्या-सम्मत २५ तत्त्वों तथा समस्त
English Hindi Dictionary
श्रीप्रपञ्चसारतंत्रम (1-2 भाग)
मूलतः आचार्य शंकर तांत्रिक थे और श्रीविद्यार्णव के रचयिता श्रीविद्यारण्य के अनुसार लोक में प्रचलित तमाम तांत्रिक-पद्धतियां शंकर से बहार नहीं. तांत्रिक प्रयोगों से लोक का कल्याण हो इसीलिए उन्होंने 'प्रपंचसारतंत्र' की रचना की और शंकर शिष्य पदमपाद ने इस पर 'विवरण' लिखा. बाद में श्री लक्ष्मणदेशिक, श्रीराघवभट्ट, श्रीविद्यारण्य तथा श्रीगिरवणेन्द्र सरस्वती जैसे तंत्रज्ञ विद्यानों ने शंकर की तांत्रिक विरासत को और भी समृद्ध किया.