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Imperial Gupta Epigraphs
Agamas in Indian Dramatics and Musicology
Keywords of Vedanta in the light of the teachings of Sri Ramana Maharshi
Khayal Vocalism
Science and the Myth of Progress
An Introduction to the Advaita Saiva Philosophy of Kashmir (HB)
Who is this Shama Churn?
"Who is this Shamachurn" is essentially a book for soul-seekers. It expounds the fact that spirituality transcends religion and the subtle juxtaposition of the various facets of spirituality, makes the truly interested and analytical reader pause and glean it's intrinsic essence. The avid reader is spellbound at such an univocal exegesis on Shamachurn and as he goes deeper and deeper finds himself being bathed by the cascades of an all-pervasive spiritual ethos heretofore not experienced while discerningly reading books on Shamachurn.
जातकपारिजातः प्रथम भाग
ज्योतिष के संहिता, होरा और सिद्धांत- इन तीन विषयों में प्रस्तुत कृति का स्थान होरा के अंतर्गत है. इसका निर्माण सर्वार्थचिन्तामणिकार वेंकटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ ने विक्रम सम्वत १४८२ में किया था. रचना मौलिक है किन्तुय इसमें श्रीपतिपद्धति, तरावली, सर्वार्थचिन्तामणि, बृहज्जातक तथा अन्य पूर्ववर्ती ग्रंथों का सार भी मिलता है. अठारह अध्यायों के इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में बाँट दिया गया है.
भारतीय संगीत का इतिहास
प्रस्तुत ग्रन्थ भारतीय संगीत का इतिहास अपने आप में असाधारण शोध-ग्रन्थ है. इसके लेखक डॉक्टर ठाकुर जयदेव सिंह बहु-आयामी व्यक्तित्व के विद्वान् थे. संगीतशास्त्र की सुविख्यात विदुषी प्रोफ. प्रेमलता शर्मा द्वारा सम्पादित इस ग्रन्थ को कोलकाता की संगीत रिसर्च अकादमी ने सन `१९९४ ईस्वी में संगीत परिदर्शिनी ग्रंथमाला के प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित किया था. भारतीय संगीत क्षेत्र का अपने ढंग का पहला अनूठा ग्रन्थ है.
Narasimha Purana
काश्मीर शिवाद्वयवाद की मूल अवधारणाएं
आगमिक संस्कृति के सारभूत काश्मीर शिवाद्वयवादी जीवन-दर्शन के प्रति विद्यानों की अनुदिन बढ़ती हुई प्रवृत्ति के बावजूद इस सम्प्रदाय की दार्शनिक, पद्यात्मक/अवधानात्मक और अनुष्ठानात्मक संरचना पर अब तक जो काम हुआ है वह बहुमूल्य होने पर भी अत्यल्प है. इस सन्दर्भा में गंभीर गवेषणा को आगे बढ़ाने के क्रम में यह ग्रन्थ एक प्रारंभिक प्रयास है जिसमें कश्मीर शिवाद्वयवाद के मौलिक चिंतनक्रम में अनुस्यूत आधारभूत विशिष्टा प्रत्ययों को रूपायित कर उनके उन्मीलन से इस सम्प्रदाय में एक अंतर्दृष्टि विक्सित करने की चेष्टा की गयी है.