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कथक नृत्य शिक्षा (द्वितीय भाग)
इस पुस्तक की रचना भातखण्डे संगीत विद्यापीठ लखनऊ, गन्धर्व महाविद्यालय मंडल - मिरज , एवं प्राचीन कला केंद्र - चंडीगढ़ की विशारद, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय - खैरागढ़ की विद , प्रयाग संगीत समिति - इलाहाबाद की प्रभाकर, राजा मानसिंघ तोमर विश्वविद्यालय - ग्वालियर की विद व संगीत कला रत्न तथा उज्जैन, इंदौर, भोपाल, बड़ौदा, वाराणसी, चंडीगढ़, पटिआला, अमृतसर आदि विश्वविद्यालय की बी.ए परीक्षा के कत्थक नृत्य विषय के पाठ्यक्रमों का सामंजस्य कर की गयी है. स्नातक स्टार के समस्त पाठ्यक्रमों के लिए तो यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी ही स्नातकोत्तर स्टार के विद्यार्थियों का भी इससे समुचित लाभ होगा.
भारतीय संगीत का इतिहास
प्रस्तुत ग्रन्थ भारतीय संगीत का इतिहास अपने आप में असाधारण शोध-ग्रन्थ है. इसके लेखक डॉक्टर ठाकुर जयदेव सिंह बहु-आयामी व्यक्तित्व के विद्वान् थे. संगीतशास्त्र की सुविख्यात विदुषी प्रोफ. प्रेमलता शर्मा द्वारा सम्पादित इस ग्रन्थ को कोलकाता की संगीत रिसर्च अकादमी ने सन `१९९४ ईस्वी में संगीत परिदर्शिनी ग्रंथमाला के प्रथम पुष्प के रूप में प्रकाशित किया था. भारतीय संगीत क्षेत्र का अपने ढंग का पहला अनूठा ग्रन्थ है.
कथक नृत्य शिक्षा (प्रथम भाग)
इस पुस्तक की रचना भातखण्डे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ, गांधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ तथा राजा मानसिंह तोमर विश्विद्यालय, ग्वालियर की प्रथम एवं मध्यमा प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद की जूनियर व सीनियर डिप्लोमा प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ की नृत्य भूषण तथा उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश बोर्ड की हाई स्कूल व इंटरमीडिएट के कत्थक नृत्य के पाठ्यक्रम के अनुसार की गयी है. विभिन्न विश्वविद्यालयों के बी. ए (नृत्य) के पाठ्यक्रमों के लिए भी यह सामान रूप से उपयोगी है.
Tantra Mantra Yantra in Dance
The Indian perspective has always been holistic and all-inclusive : thought and activity in different fields, at different levels, have been interlinked to produce what has been timeless. Indian arts is a classic example of such amalgamation : it interlinks aspects of art, philosophy, mythology, religion, and mysticism. This book is an attempt to unravel such links with specific reference to the Kathaka dance form.
श्रीनीलतन्त्रम
कंकालमालिनीतंत्रम
रुद्रयामलम उत्तरतन्त्रम
On the Meaning of the Mahabharata
योगिनीहृदयम
योगिनीह्रदयम भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अंतर वरिवस्या का प्रतिपादक ग्रन्थ है. इसमें तीन पटल हैं: चक्रसंकेत, मन्त्रसङ्केत और पूजासंकेत. प्रथम पटल में भगवती के अवतार-स्थान श्रीचक्र का आध्यात्मिक स्वरुप प्रदर्शित किया गया है की किस प्रकार विसटीर्ना तत्त्व विश्वमय बन जाता है. शक्ति के अम्बिकादि तथा शान्तादि चार प्रकारों, वाणी के पारा आदि चार भेड़ों, चार पीठों, चार लिंगों, संख्या-सम्मत २५ तत्त्वों तथा समस्त